पांडव करूप

देख बैठे हैं पंच धुर्त
धर पांडव का रूप
और कह रहे हैं मुझ को
कौरवो का दुर्योधन करूप

कहो मुझे दुर्योधन फिर भी
भेज्ता हूँ मैं शांती दूत
और जो बैठे हैं सिंघासन पर
पांडव बन हुंकार रहे हैं युद्ध युद्ध

सोचते है की डंके की चोट पर
छिपा देंगे वह अपना झूट
और कटार छुपा कर आये थे
खेलने नीति कूट विकृप

हम बड़े है मांग लो माफ़ी
माफ़ कर देंगे तेरा झूट
बस बतला दो संसार को की
तुम ही हो दुर्योधन करूप

नहीं चाहिए शांति तो न सही
देख फिर महासमर का विकराल रूप
और सुन मेरे शंख की ललकार को
जिसे है सारा संसार रहा गूँज

संसार अब बाँट चूका है
सेना है बजा रहे बिगुल
फिर हो रहा है महाभारत
बाचने अपने सच और झूट

अब देरी नहीं युद्ध भूमि तईयार है
है खड़े पांच उधर पाण्डव बन धूर्त
और मैं खड़ा अकेला इस तरफ
बतला रहे मुझको दुर्योधन करूप

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